
कॉलेज का मनमौजी समीर बना एक मासूम बच्ची का सहारा | दिल छू लेने वाली प्रेरणादायक कहानी
मैं समीर हूँ… हवा की तरह
वह अक्सर कहा करता था —
“मैं समीर हूँ… हवा की तरह, जो कभी नहीं ठहरता।”
कॉलेज में उसका अंदाज़ सबसे अलग था।
मनमौजी, बेफिक्र, हमेशा हँसता हुआ।
न किताबों से दोस्ती,
न भविष्य की चिंता।
जब भी कैंटीन में दिखता, दोस्तों के साथ ठहाके लगाता मिलता।
कभी प्रोफेसर की नकल, कभी मज़ाक…
मानो ज़िंदगी में उसे किसी बात की गंभीरता छू ही नहीं गई हो।
ना वह मेरा दोस्त था,
ना कोई एकतरफ़ा लगाव था।
फिर भी ना जाने क्यों…
उसका यूँ लापरवाह होना मुझे अंदर से खलता था।
उसकी पूरी शख्सियत में अगर कुछ सबसे ज़्यादा आकर्षित करता था,
तो वो थीं उसकी आँखें।
गहरी… शांत… और जैसे कोई राज़ छुपाए हुए।
कैंटीन की वो दोपहर
एक दिन क्लास में मन नहीं लग रहा था।
मैं कैंटीन चली गई।
हमारे कॉलेज में क्लास बंक करके कैंटीन जाना जैसे एक परंपरा थी।
सब छात्र प्रोफेसरों की नकल उतार रहे थे।
कोई रीता मैम के स्टाइल का दीवाना था,
कोई प्रोफेसर राम के तीखे व्यंग पर नाराज़।
और बीच में बैठा समीर…
सबसे ज़्यादा ठहाके लगाता हुआ।
उसका यूँ सबके मज़ाक में शामिल होना मुझे अच्छा नहीं लगता था।
कई बार सोचा उससे कहूँ —
“अपने लिए कुछ सोचो… आगे क्या करना है?”
पर फिर खुद को रोक लिया।
मैं क्यों कहूँ?
वह मेरी बात क्यों मानेगा?
जब ऐसा कुछ नहीं था,
तो आज मैं उसकी कहानी क्यों लिख रही हूँ?
शायद इसलिए…
कभी-कभी कहानी लिखने के लिए खास किरदार की नहीं,
एक आम इंसान को खास बनाने की ज़रूरत होती है।
सालों बाद…
समय बीत गया।
मेहनत, संघर्ष और सपनों के बीच मैंने अपनी ज़िंदगी झोंक दी।
और एक दिन…
मेरी सबसे बड़ी ख्वाहिश पूरी हुई।
मैं — निहारिका अवस्थी,
अपने ही शहर बनारस के आर्य महिला पीजी कॉलेज की नई प्रिंसिपल बन चुकी थी।
बनारस…
जहाँ की हवा में भी अपनापन घुला होता है।
पहला दिन था।
मैंने सभी क्लास का दौरा किया, शिक्षकों से मिली।
दिल खुश था।
तभी त्रिपाठी सर ने एक प्यून को बुलाया —
“मैडम के लिए कुल्हड़ वाली चाय लाओ।”
कुल्हड़ वाली चाय का अपना ही स्वाद होता है।
कुछ देर बाद प्यून अंदर आया।
उसने चाय टेबल पर रखी।
जैसे ही मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी…
दिल जैसे रुक गया।
वही आँखें।
वही शांत चेहरा।
मैंने उसे गौर से देखा।
कहीं तो देखा है…
पर कहाँ?
वह चला गया।
और मैं यादों में उलझी रह गई।
“मैडम जी, मेरा नाम समीर है।”
कुछ दिन बाद मैंने उसे रोक लिया।
“तुम्हारा नाम क्या है?”
वह बोला —
“मैडम जी, मेरा नाम समीर है।”
अचानक कैंटीन का वह समीर आँखों के सामने घूम गया —
“मैं समीर हूँ… हवा की तरह…”
पर क्या यह वही हो सकता है?
एक अनजाना सच
त्रिपाठी सर से पता चला —
वह गुजरात से है।
पत्नी गुजर चुकी है।
एक छोटी सी बेटी है।
मैं अंदर तक हिल गई।
इतनी कम उम्र में शादी?
पत्नी की मौत?
बच्ची?
मेरे मन में सवालों का तूफ़ान था।
उसका घर… और वह बच्ची
एक दिन मैं उसके घर पहुँची।
दरवाज़ा एक पाँच साल की बच्ची ने खोला।
“पापा, कोई आंटी आई हैं।”
मैंने उसे गोद में उठाया और अंदर चली गई।
समीर बर्तन धो रहा था।
मुझे देखकर चौंक गया।
मैंने पूछा —
“इतनी जल्दी शादी… और इतनी प्यारी बेटी?”
वह बस मुस्कुरा दिया।
उसकी मुस्कान मुझे चुभ गई।
सच्चाई जो उसने कभी नहीं बताई
घर लौटते समय मेरा पैर फिसला।
एक बुजुर्ग महिला ने मुझे उठाया और अपने घर ले गईं।
बातों-बातों में मैंने समीर का ज़िक्र किया।
वह मुस्कुराईं।
“अच्छा… उसने तुम्हें भी गुमराह किया?”
मैं चौंक गई।
उन्होंने बताया —
गुजरात के एक अस्पताल में एक प्रेमी जोड़े ने बच्ची को जन्म दिया…
और उसे वहीं छोड़कर भाग गए।
लोग उस मासूम को कोस रहे थे।
तभी समीर वहाँ आया।
उसने उस नवजात को गोद में उठाया।
सारी कागज़ी कार्रवाई की।
और उसे अपना लिया।
वह अविवाहित था।
लोगों ने उसके फैसले को पागलपन कहा।
पर उसे परवाह नहीं थी।
वह खुद अनाथ था।
शायद उसने वह दर्द झेला था —
जो वह उस बच्ची को नहीं झेलने देना चाहता था।
बनारस आने पर वह बच्ची को भी साथ ले आया।
दिन में कॉलेज में काम करता,
और बच्ची को उस बुजुर्ग महिला के पास छोड़ जाता।
आज समझ आया…
जिसे हम गैरज़िम्मेदार समझते थे…
वही सबसे बड़ा इंसान निकला।
वह सच में समीर था —
हवा की तरह।
खुद बिखर कर भी
दूसरों को समेट लेने वाला।
कुछ लोग अपने दर्द का शोर नहीं मचाते।
बस चुपचाप किसी और की दुनिया संवार देते हैं।
उस दिन उसके सामने मेरा कद छोटा हो गया।
शायद मैं यह साहस नहीं कर पाती।
सीख
जिनसे हमें कोई उम्मीद नहीं होती,
अक्सर वही हमें ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक दे जाते हैं।
कुछ लोग हवा की तरह होते हैं —
दिखते नहीं…
पर किसी की पूरी दुनिया बदल जाते हैं।



